– तीनों फैसले निचली अदालतों, पुलिस अनुसंधान, वकीलों और लॉ की पढ़ाई कर रहे स्टूडेंट के लिए नजीर
– बच्चे के अपहरण और हत्या मामले का आरोपी बरी
पटना.
पटना हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अंशुल की खंडपीठ ने सहरसा और बेगूसराय से जुड़े तीन मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इसको लेकर कोर्ट ने कानून की पूरी व्याख्या की और बताया कि क्यों बरी किया जा रहा है। ये तीनों फैसले निचली अदालतों, पुलिस अनुसंधान, वकीलों और लॉ की पढ़ाई कर रहे स्टूडेंट के लिए नजीर हैं। खंडपीठ ने राजेश प्रसाद गुप्ता को बालक के अपहरण और हत्या के मामले में दोषसिद्धि के बावजूद बरी कर दिया। न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अंशुल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।
अभियोजन का मामला सहरसा के नोहट्टा थाना से जुड़ा था और मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था। अभियोजन ने मृतक को अभियुक्त के साथ अंतिम बार देखे जाने की परिस्थिति, कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति और शव की बरामदगी को अभियुक्त के विरुद्ध महत्वपूर्ण परिस्थितियों के रूप में प्रस्तुत किया था। न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में लागू स्थापित सिद्धांतों की कसौटी पर प्रत्येक परिस्थिति का परीक्षण किया और पाया कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रस्तुत परिस्थितियां ऐसी पूर्ण और निर्णायक श्रृंखला नहीं बनातीं, जिससे दोष का निष्कर्ष निकलता हो।
इस निर्णय का महत्वपूर्ण पक्ष दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के संबंध में न्यायालय द्वारा किया गया विस्तृत विचार है। न्यायालय ने कहा कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रयुक्त किया जाने वाला कोई भी आपत्तिजनक या दोषारोपणकारी तथ्य यदि धारा 313 के अंतर्गत उसके बयान के समय उसके सामने रखा ही नहीं गया है, तो बाद में उस परिस्थिति को उसके विरुद्ध दोषसिद्धि के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता। निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि धारा 313 केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का हिस्सा है, जिसके माध्यम से अभियुक्त को उसके विरुद्ध सामने आई परिस्थितियों का स्पष्टीकरण देने का अ
वसर मिलता है।
वर्तमान मामले में कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति को अभियोजन ने एक महत्वपूर्ण परिस्थिति के रूप में प्रस्तुत किया था, लेकिन उसे अभियुक्त के समक्ष धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत नहीं रखा गया था। इसलिए न्यायालय ने माना कि अभियोजन उस कथित स्वीकारोक्ति को अभियुक्त के विरुद्ध दोषारोपणकारी परिस्थिति के रूप में उपयोग नहीं कर सकता। न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि घटना वर्ष 2003 की थी और इतने लंबे समय बाद धारा 313 के अंतर्गत पुनः अभियुक्त का परीक्षण कराने के लिए मामले को वापस भेजना स्वयं अन्यायपूर्ण होगा। इसलिए न्यायालय ने अभियुक्त की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त करते हुए उसे आरोपों से बरी कर दिया।
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बस में गोलीबारी के मामले में दोषसिद्ध व्यक्ति को बरी किया
दूसरे मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अंसुृल की खंडपीठ ने रंजीत महतो को बस में हुई गोलीबारी के मामले में बरी कर दिया। इस घटना में दो व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी और अन्य लोग घायल हुए थे। मामला बेगूसराय जिले के नीमाचंदपुर थाने का है।
मामला मुख्य रूप से सूचना देने वाली अरुणा देवी के बयान पर आधारित था। उन्होंने स्वयं को घटना की प्रत्यक्षदर्शी बताते हुए गोली चलाने वालों में अभियुक्त की पहचान की थी। हालांकि, न्यायालय ने बस में उनकी उपस्थिति और हमलावरों को पहचानने से जुड़े बयान में महत्वपूर्ण असंगतियां पाईं। घटना में घायल दो प्रत्यक्षदर्शियों ने अभियुक्त की पहचान नहीं की। इनमें से एक ने स्पष्ट रूप से कहा कि गोली चलाने वाले व्यक्ति वे नहीं थे जो न्यायालय में अभियुक्त के रूप में खड़े थे। स्वतंत्र गवाहों से भी अभियोजन के मामले को आवश्यक पुष्टि नहीं मिली।
इस निर्णय का विशेष महत्व प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य की विश्वसनीयता और भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के प्रयोग के संबंध में न्यायालय के विचार में है। न्यायालय ने कहा कि यदि मुख्य पहचानकर्ता गवाह का साक्ष्य ऐसा नहीं है कि उसके आधार पर सुरक्षित रूप से दोषसिद्धि की जा सके और अभियुक्त की पहचान के महत्वपूर्ण प्रश्न पर स्वतंत्र साक्ष्य से पुष्टि भी नहीं होती है, तो केवल सामूहिक आपराधिक मंशा के सिद्धांत का सहारा लेकर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 34 का उपयोग साक्ष्य में मौजूद कमी को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता। सामूहिक आपराधिक मंशा व्यक्तिगत भागीदारी के प्रमाण का विकल्प नहीं है। धारा 34 को लागू करने से पहले अभियोजन को विश्वसनीय साक्ष्य के माध्यम से यह स्थापित करना आवश्यक है कि संबंधित अभियुक्त ने स्वयं आपराधिक कृत्य में भाग लिया था।
न्यायालय ने विवेचना की कमियों पर भी विचार किया। हत्या में प्रयुक्त हथियार बरामद नहीं हुआ, कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई गई और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के समक्ष मृतकों में से एक की पहचान भी स्थापित नहीं की गई थी। सभी साक्ष्य का मूल्यांकन करने के बाद न्यायालय ने पाया कि मुख्य प्रत्यक्षदर्शी का बयान स्वतंत्र पुष्टि के अभाव में दोषसिद्धि का सुरक्षित आधार नहीं बन सकता। इसलिए दोषसिद्धि और सजा को निरस्त करते हुए अभियुक्त को बरी कर दिया गया।
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हत्या मामले में दोष सिद्ध प्रदीप महतो बरी
तीसरे मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अंशुल की खंडपीठ ने सुखो सदा की हत्या के मामले में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत दोषसिद्ध प्रदीप महतो को बरी कर दिया। यह मामला बेगूसराय के बखरी थाने का है।
निर्णय की विशेषता यह है कि न्यायालय ने केवल अलग-अलग गवाहों की विश्वसनीयता की जांच नहीं की, बल्कि अभियोजन के मामले के मूल स्रोत और FIR की स्वाभाविकता की भी गहराई से जांच की।
अभियोजन का मामला था कि प्रदीप महतो ने विवाद के बाद ताड़ के पेड़ के पास सुखो सदा को गोली मार दी। हालांकि, जिन गवाहों को प्रत्यक्षदर्शी के रूप में प्रस्तुत किया गया था, उनमें से कई ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उन्होंने वास्तव में घटना को घटित होते हुए नहीं देखा था। न्यायालय ने पाया कि P.W. 3 सत्तन सदा, P.W. 6 अशोक सदा तथा P.W. 7 एतवारी सदा के बयान उनके प्रत्यक्षदर्शी होने के दावे का समर्थन नहीं करते थे। यहां तक कि सूचक P.W. 10 पवन सदा के प्रत्यक्षदर्शी होने के दावे की भी अन्य गवाहों के बयानों से पुष्टि नहीं हुई।
निर्णय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू मृतक की पत्नी खखरी देवी से संबंधित है। साक्ष्य से यह सामने आया कि घटना की सूचना मिलने के बाद वह घटनास्थल पर पहुंची थी और पुलिस द्वारा उसका बयान लिया गया था। लेकिन उसका औपचारिक बयान अभिलेख पर नहीं लाया गया और उसे अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में भी परीक्षित नहीं कराया गया। न्यायालय ने इस महत्वपूर्ण गवाह को प्रस्तुत न किए जाने और प्रारंभिक सूचना को दबाए जाने को अभियोजन के मामले के लिए गंभीर महत्व का माना।
इसके बाद न्यायालय ने FIR और इनक्वेस्ट रिपोर्ट की समयावली की जांच की। औपचारिक FIR रात 11:00 बजे दर्ज की गई बताई गई, जबकि इनक्वेस्ट रिपोर्ट शाम 5:45 बजे तैयार हो चुकी थी और उसमें पहले से ही FIR का केस नंबर अंकित था। न्यायालय ने पाया कि FIR का केस नंबर औपचारिक FIR दर्ज होने के बाद ही दिया जा सकता था और इस आधार पर FIR को antedated माना।
न्यायालय ने यह भी देखा कि घटना लगभग 4:00 बजे हुई थी, पुलिस घटनास्थल पर ऐसी सूचना के आधार पर पहुंची जिसे विवेचक ने स्वयं अफवाह के रूप में वर्णित किया, जबकि औपचारिक FIR काफी बाद में दर्ज की गई। इसके अतिरिक्त FIR 28 मार्च 2007 को मजिस्ट्रेट के पास पहुंची। न्यायालय ने माना कि मृतक की पत्नी के प्रारंभिक बयान को दबाए जाने और इनक्वेस्ट रिपोर्ट के antedating के साथ इन परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर FIR से सामान्यतः जुड़ी स्वाभाविकता और तत्क्षणता समाप्त हो जाती है।
निर्णय में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के अंतर्गत FIR को मजिस्ट्रेट को भेजे जाने में हुई देरी के महत्व पर भी विचार किया गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसी देरी अपने आप में हमेशा घातक नहीं होती, लेकिन FIR के पंजीकरण और उससे संबंधित दस्तावेजों की तैयारी की अन्य परिस्थितियों के साथ मिलाकर उसका महत्व निर्धारित किया जाना चाहिए।
FIR में देरी, मृतक की पत्नी का बयान अभिलेख पर न होना, इनक्वेस्ट रिपोर्ट का antedating, FIR को मजिस्ट्रेट को भेजने में देरी और प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य की कमजोरियों को न्यायालय ने अलग अलग तकनीकी त्रुटियों के रूप में नहीं देखा। इन सभी परिस्थितियों को एक साथ रखकर यह जांच की गई कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत FIR वास्तव में घटना की प्रथम और स्वाभाविक सूचना थी या नहीं।
समस्त परिस्थितियों के मूल्यांकन के बाद न्यायालय ने अभियोजन के मामले पर गंभीर संदेह पाया और दोषसिद्धि व सजा को निरस्त करते हुए प्रदीप महतो को बरी कर दिया।
