संवाददाता. पटना

गुस्से से उपजे उपन्यास ‘छाया सच’ पर पटना के बापू टावर में बातचीत का आयोजन समन्वय ने शनिवार को किया। चर्चित उपन्यासकार संतोष दीक्षित के नए उपन्यास की कथाभूमि पटना सिटी की है और कालखंड वीर कुंवर सिंह की शहादत और 1857 के गदर के बाद का है जब ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म हो गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटेन से निर्देशित होने लगा। इस अवसर पर वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे।

कवि रमेश ऋतंभर ने कहा कि संतोष दीक्षित ने पटना के ‘दीवान मोहल्ले’ का जिक्र काफी अच्छे तरीके से किया है। वही लेखक बड़ा है जो अपने आसपास, अपने मोहल्ले, गांव, कस्बे से चीजों को अपनी रचना में उठाता है और उसकी पीड़ा, उसके इतिहास, उसकी छटपटाहट, प्रतिरोध, उसकी जीवंतता को रेखांकित करता है। उन्होंने ‘मुर्गियाचक में ईद’ कहानी को इसी संदर्भ में याद करते हुए कहा कि उपन्यास में लेखक की अंतदृष्टि दिखती है। इसलिए एक अच्छे लेखक को समझने के लिए उनके आसपास की चीजों को भी समझना चाहिए जो उसे बड़ा बनाती हैं।

लेखक रणेन्द्र ने कहा कि ‘छाया सच’ उपन्यास 1857 से बंगाल विभाजन के पहले तक का उपन्यास है। महेन्द्रू, पटना साहिब, मछरहट्टा से लेकर गलियां उपन्यास में आता है तो कई चीजें याद आने लगती है। उपन्यास में राजनीतिक जागरण अधिक है। इसमें ब्रिटेन, ब्रिटेन का शोषण, बदल रहा समाज है। व्यायामशाला की अच्छी चर्चा है कि इसमें कैसे देशभक्ति की बात थी। कई रोचक जानकारियां उन्होंने दी है। कई बार यह लगता है कि कथा कम और सूचनाएं ज्यादा होने लगती है लेकिन एक बार पढ़ना शुरू करें तो आपको पूरा पढ़ने को बाध्य करने वाला उपन्यास है। इसमें उस कालखंड की बातें हैं जिस पर लोगों का ध्यान कम गया क्योंकि उस समय बंगाल में अधिक गतिविधियां हो रही थीं।

निखिल आनंद गिरी ने कहा कि भांडों के जरिेए बातों को कहने की कोशिश लेखक ने की है। कई बार इसमें जैसे कहानी फिर से शुरू हो जाती है। हम सब ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां सर्विलांस का दौर है, कैमरे की नजर है। व्यक्ति दूसरे को संदेह की नजर से देख रहा है। ऐसे खतरनाक दौर में संतोष दीक्षित का नया उपन्यास आया है। वे इतिहास की घटनाओं के बहाने कई बातों को रखने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। इसमें बहुरुपिए,पहलवान, गुंडे, भांड जैसे पात्र दिखते हैं जो बड़ी भूमिका निभाते हुए दिखते हैं।

वरिष्ठ लेखक यादवेन्द्र ने कहा कि यह उपन्यास एक गुस्से के कारण लिखा गया। लेकिन लेखक ने तत्कालीन समय की कई सूचनाओं को जुटाया है और उससे इतिहास को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलती है।

आयोजन का संचालन करते हुए सुशील ने कहा कि वर्तमान समय में संतोष दीक्षित का नया उपन्यास ‘छाया सच’ एक जरूरी हस्तक्षेप करता है। उनके सोचने, समझने और बातों को रखने का अपना रोचक और शोधपरक नजरिया है। यही उपन्यास को महत्वपूर्ण बनाता है और इतिहास के उस बड़े कालखंड से अवगत कराता है जिसे समझना इस समय में जरूरी है। इस अवसर पर त्रिपुरारी शरण, विनय कुमार, संजय कुमार कुंदन, राजीव रंजन, प्रभात परिणीत, बालमुकुंद, गुंजन उपाध्याय पाठक, प्रणय प्रियंवद, अनीस अंकुर, प्रशांत विप्लवी, राजेश कमल, अरविंद पासवान, जयप्रकाश,आनंद माधव, राजेन्द्र शर्मा, सुनीता गुप्ता, कुमार वरुण, भावना शेखर आदि की उपस्थिति खास रही।