संवाददाता. पटना

युवाओं के अधिकार — शिक्षा, नौकरी और रोजगार विषय पर एक दिवसीय गोष्ठी का आयोजन पटना के बाबू जगजीवन राम शोध संस्थान में किया गया, जिसमें युवाओं के भविष्य, आर्थिक विकास तथा वर्तमान चुनौतियों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। इसमें प्रमुख वक्ता के रुप में आमंत्रित थे सांसद सुधाकर सिंह, पूर्व मंत्री आलोक मेहता,एमएलसी अजय सिंह, युवा राजद के प्रदेश अध्यक्ष राजेश यादव, सामाजिक कार्यकर्ता मुकुंद सिंह,राजद की प्रभारी महिला अध्यक्ष निता भारती, स्टूडेंट एक्टिविस्ट रंजन यादव। अध्यक्षता सबोध कुमार मेहता ने की।

संगोष्ठा में वक्ताओं ने कहा कि केंद्र एवं बिहार सरकार की युवाओं के प्रति उदासीनता अब असहनीय होती जा रही है । युवाओं को केवल उपभोक्ता बनाकर शिक्षा व्यवस्था को कमजोर किया गया है और उसे बाजार के हाथों बेच दिया गया है । शिक्षा पर सरकारी खर्च लगातार कम किया जा रहा है । CAG की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा क्षेत्र के लिए निर्धारित लगभग एक लाख करोड़ रुपये का समुचित उपयोग भी सरकार नहीं कर पाई है ।

नई शिक्षा नीति के माध्यम से बच्चों के बीच डिजिटल डिवाइड को और बढ़ावा मिला है । संसाधनों के विकास के नाम पर HEFA के जरिए शैक्षणिक संस्थानों को कर्ज के बोझ तले धकेला जा रहा है । स्थिति यह है कि दो-तीन संस्थानों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश कॉलेज NAAC की B और C श्रेणी में हैं, जो उच्च शिक्षा की बदहाल स्थिति को दर्शाता है ।

छात्रों के नामांकन और परीक्षाओं के लिए वर्ष 2017 में NTA का गठन किया गया, लेकिन पिछले नौ वर्षों में लगभग 90 पेपर लीक के मामले सामने आ चुके हैं । NTA के पास अपनी मजबूत व्यवस्था तक नहीं है और वह पूरी तरह आउटसोर्स व्यवस्था पर निर्भर है ।

रोजगार के मुद्दे पर चर्चा करते हुए बताया गया कि पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार ने अपने विभिन्न विभागों एवं PSU में मात्र 7.5 लाख नौकरियां दी हैं, जबकि आवेदनों की संख्या 25 करोड़ से अधिक रही है । वहीं बिहार में लगभग 10 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं, इसके बावजूद विभिन्न विभागों में करीब 7 लाख पद आज भी खाली पड़े हैं। जब छात्र और युवा नौकरी की मांग करते हैं तो उन पर लाठीचार्ज किया जाता है और सरकार अपने दायित्वों से पीछे हट जाती हैं । जब तक कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार नहीं होगा, तब तक बिहार में रोजगार सृजन संभव नहीं है । केंद्र की नीतियों के कारण बिहार के पारंपरिक उद्योग धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं ।

जब तक बिहार सरकार युवाओं को नीति निर्माण के केंद्र में रखकर ठोस योजनाएं नहीं बनाएगी, तब तक पलायन रुकना मुश्किल है । आंकड़ों के अनुसार बिहार की लगभग 58 प्रतिशत आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है । यह आबादी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में होनी चाहिए थी, लेकिन वर्तमान में केवल लगभग 2 करोड़ बच्चे विद्यालयों में और 24 लाख छात्र विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत हैं । इसका अर्थ है कि 4 करोड़ से अधिक युवा शिक्षा, रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में बिहार से बाहर हैं । यह स्थिति किसी अभिशाप से कम नहीं है ।

गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि पलायन, बेरोजगारी और शिक्षा की बदहाल स्थिति ने एक ऐसे चक्रव्यूह का निर्माण कर दिया है, जिसमें बिहार का युवा फंसता चला जा रहा है । इस एक दिवसीय गोष्ठी के माध्यम से बिहार के युवाओं के लिए कैसी नीति बनाई जाए, रोजगार के नए अवसर कैसे सृजित हों, शिक्षा व्यवस्था को कैसे मजबूत किया जाए तथा पलायन को कैसे रोका जाए — इन सभी विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई ।