लोकगीतों से ही बिहार की ब्रांडिंग
पटना.
बिहार की प्रसिद्ध लोक गायिका विजया भारती ने शनिवार को पटना में पत्रकारों से बातचीत की। विजया भारती दूरदर्शन और आकाशवाणी की ए ग्रेड आर्टिस्ट वर्षों से हैं। विश्व के कई देशों की यात्राएं कर चुकी हैं। दर्जनों लोकगीत उन्होंने लिखे भी हैं। बिहार के लोकगीतों के प्रचार-प्रसार और कलाकारों की चिंता के साथ उन्होंने बिहार सरकार के कला संस्कृति विभाग के अफसरों सचिव प्रणव कुमार और निदेशक रूबी से एक दिन पहले मुलाकात की और कई सुझाव भी दिए। उन्होंने पत्रकारों से बाचतीत में बिहार सरकार की ओर से अश्लील एवं द्विअर्थी लोकगीतों पर प्रतिबंध लगाए जाने के फैसले का स्वागत किया। कहा कि संगीत और लोकगीत बिहार के मनप्राणों में बसते हैं इसलिए इसके बिना ब्रांड बिहार पुनर्निर्मित नहीं हो सकता। उन्होंने सरकार से मांग की कि पटना में एक विशेष कला ग्राम की स्थापना राज्य के सांस्कृतिक पुनरुत्थान, कलाकारों के प्रोत्साहन और विभिन्न कलाओं के समग्र विकास, संरक्षण और संवर्धन के लिए किया जाए।
उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों के साथ प्रोत्साहन भी अनिवार्य है। कोविड-19 के बाद बिहार के हजारों लोक कलाकार आज भी संघर्ष कर रहे हैं। उनके लिए मंच, मानदेय, बीमा, पेंशन एवं प्रशिक्षण यही सच्ची सांस्कृतिक सेवा होगी।
कहा कि दुर्गापूजा के अवसर पर उनका नया गीत आया है। छठ के अवसर पर भी गीत आ रहे हैं। उन्होंने अपना खुद का लिखा छठ का गीत गाकर सुनाया- अरघ पड़ेला चहुंओर….। उन्होंने अंगिका लोकगीत भी गाकर सुनाया। उन्होंने बताया कि आईसीसीआर की ओर 30 अक्टूबर को कई देशों की यात्रा पर जा रही हूं। भारत सरकार कला संस्कृति विभाग की तरफ से एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहू हूं जिसके तहत बिहार की लुप्तप्राय गीतों का एक संकलन भी तैयार कर रही हूं वह जल्द ही लोगों के सामने होगा। मैथिली और भोजपुरी के गीतों पर अभी काम करना है इसके बाद अंगिका, महगी पर भी काम करूंगी।
विदेश में जब कभी जाकर गीत गाने का मौका मिलता है मैं इमोशनल हो जाती हूं। दूसरी भाषा के लोग भी बिहार की भाषाओं के गीत सुनकर नाचने लगते हैं। विजया भारती ने कहा कि बिहार ही वह धरती है जहां महाकवि विद्यापति ने मैथिली को अमर कर दिया, जहां भिखारी ठाकुर ने लोक-नाट्य को जनता की आवाज बनाया, जहां महेंद्र मिसिर ने मगही को साहित्य की गरिमा दी। यह वही भूमि है जहां महात्मा गांधी ने चंपारण सत्याग्रह से सत्य और अहिंसा को विश्व-पटल पर स्थापित किया, जहां बाबू कुंवर सिंह ने 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंका। यहां सोहर जन्म का स्वर है, समदाउन विदाई का, कजरी विरह की, चैती फसल की, झूमर उल्लास का, निर्गुण आत्म-खोज का, और छठ गीत सूर्य-उपासना का। मिथिला की मधुबनी, भोजपुर का आरा, मगध का राजगीर, अंग की भागलपुर, बज्जिका की बोली ये केवल नाम नहीं, सभ्यता के स्तंभ हैं। बिहार की पहचान उसकी विविधता में है भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका, बज्जिका, अवधी में है।
विजया भारती ने कहा कि मैं दिल्ली में रहती हूं लेकिन मेरा मन-प्राण बिहार में रचता-बसरा है। इसलिए बिहार आती रहती हूं।
