-सहकारी संस्थाओं की मजबूती से ही सहकारिता आधारित ग्रामीण विकास को मिलेगी गति
संवाददाता. पटना
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), बिहार क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा ग्रामीण सहकारी बैंकों के लिए“एनपीए प्रबंधन पर कार्यशाला” का आयोजन किया गया। कार्यशाला में बिहार के ग्रामीण सहकारी बैंकों के प्रबंध निदेशकों तथा वरिष्ठ बैंक अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण सहकारी बैंकों में ऋण पोर्टफोलियो की गुणवत्ता में सुधार, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की समय पर पहचान, प्रभावी ऋण निगरानी तथा वसूली व्यवस्था को मजबूत करना था।
कार्यशाला के मुख्य अतिथि धर्मेन्द्र सिंह, भा.प्र.से., सचिव, सहकारिता विभाग, बिहार सरकार थे। कार्यक्रम में गौतम कुमार सिंह, मुख्य महाप्रबंधक, नाबार्ड, बिहार क्षेत्रीय कार्यालय, मनोज कुमार, प्रबंध निदेशक, वेजफेड तथा अरविंद पासवास, प्रबंध निदेशक, बिहार राज्य सहकारी विभाग विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। संजय कुमार गुप्ता, मुख्य महाप्रबंधक, नाबार्ड, बिहार क्षेत्रीय कार्यालय ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यक्रम में सहभागिता की।
मुख्य अतिथि धर्मेन्द्र सिंह, भा.प्र.से., सचिव, सहकारिता विभाग, बिहार सरकार ने कहा कि बिहार सरकार सहकारिता आधारित ग्रामीण विकास (Cooperative-led Rural Development) की अवधारणा को प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने कहा कि सहकारी संस्थाएं केवल वित्तीय सेवाएं प्रदान करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने, किसानों की आय बढ़ाने तथा स्थानीय स्तर पर आजीविका के अवसर सृजित करने का महत्वपूर्ण साधन हैं। उन्होंने ग्रामीण सहकारी बैंकों से अपेक्षा की कि वे स्वस्थ ऋण पोर्टफोलियो, बेहतर वसूली व्यवस्था तथा उत्तरदायी ऋण प्रबंधन के माध्यम से सहकारी क्षेत्र को और अधिक मजबूत बनाएं।
कार्यशाला में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि सहकारी क्षेत्र ग्रामीण विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है तथा सहकारिता आधारित विकास मॉडल गांवों में आर्थिक गतिविधियों, रोजगार सृजन और समावेशी विकास को गति प्रदान कर सकता है। इसके लिए सहकारी बैंकों की वित्तीय स्थिरता, प्रभावी ऋण प्रबंधन तथा सुदृढ़ वसूली तंत्र अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम में यह आह्वान किया गया कि सहकारी बैंकों को केवल एनपीए अनुपात में कमी तक सीमित न रहकर एक ऐसी ऋण संस्कृति विकसित करनी चाहिए जो पारदर्शिता, जवाबदेही, समयबद्ध निगरानी तथा प्रभावी वसूली पर आधारित हो। इससे न केवल सहकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी, बल्कि सहकारिता आधारित ग्रामीण विकास को भी नई गति मिलेगी।
